श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—इस प्रकार जब वन्दीजनने महाराज पृथुके गुण और कर्मोंका बखान करके उनकी प्रशंसा की, तब उन्होंने भी उनकी बड़ाई करके तथा उन्हें मनचाही वस्तुएँ देकर सन्तुष्ट किया॥ १॥
एवं स भगवान् वैन्यः ख्यापितो गुणकर्मभिः।
छन्दयामास तान् कामैः प्रतिपूज्याभिनन्द्य च॥ १
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—इस प्रकार जब वन्दीजनने महाराज पृथुके गुण और कर्मोंका बखान करके उनकी प्रशंसा की, तब उन्होंने भी उनकी बड़ाई करके तथा उन्हें मनचाही वस्तुएँ देकर सन्तुष्ट किया॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.17.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 488) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/17/1/