ये अकेले ही समय-समयपर प्रजाके पालन, पोषण और अनुरंजन आदि कार्यके अनुसार अपने शरीरमें भिन्न-भिन्न लोकपालोंकी मूर्तिको धारण करेंगे तथा यज्ञ आदिके प्रचारद्वारा स्वर्गलोक और वृष्टिकी व्यवस्थाद्वारा भूलोक—दोनोंका ही हित साधन करेंगे॥ ५॥
एष वै लोकपालानां बिभर्त्येकस्तनौ तनूः।
काले काले यथाभागं लोकयोरुभयोर्हितम्॥ ५
ये अकेले ही समय-समयपर प्रजाके पालन, पोषण और अनुरंजन आदि कार्यके अनुसार अपने शरीरमें भिन्न-भिन्न लोकपालोंकी मूर्तिको धारण करेंगे तथा यज्ञ आदिके प्रचारद्वारा स्वर्गलोक और वृष्टिकी व्यवस्थाद्वारा भूलोक—दोनोंका ही हित साधन करेंगे॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.16.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 486) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/16/5/