श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.16.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

देहिनामात्मवत्प्रेष्ठः सुहृदां नन्दिवर्धनः।

मुक्तसंगप्रसंगोऽयं दण्डपाणिरसाधुषु॥ १८

dehināmātmavatpreṣṭhaḥ suhṛdāṃ nandivardhanaḥ|

muktasaṃgaprasaṃgo'yaṃ daṇḍapāṇirasādhuṣu|| 18

अर्थ

दूसरे प्राणी इन्हें उतना ही चाहेंगे जितना अपने शरीरको। ये सुहृदोंके आनन्दको बढ़ायेंगे। ये सर्वदा वैराग्यवान् पुरुषोंसे विशेष प्रेम करेंगे और दुष्टोंको दण्डपाणि यमराजके समान सदा दण्ड देनेके लिये उद्यत रहेंगे॥ १८॥

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