श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.16.1

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

अथ षोडशोऽध्यायः

वन्दीजनद्वारा महाराज पृथुकी स्तुति

मैत्रेय उवाच

इति ब्रुवाणं नृपतिं गायका मुनिचोदिताः।

तुष्टुवुस्तुष्टमनसस्तद्वागमृतसेवया ॥ १

iti bruvāṇaṃ nṛpatiṃ gāyakā municoditāḥ|

tuṣṭuvustuṣṭamanasastadvāgamṛtasevayā || 1

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—महाराज पृथुने जब इस प्रकार कहा, तब उनके वचनामृतका आस्वादन करके सूत आदि गायकलोग बड़े प्रसन्‍न हुए। फिर वे मुनियोंकी प्रेरणासे उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे॥ १॥

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