॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.15.23
तस्मात्परोक्षेऽस्मदुपश्रुतान्यलं
करिष्यथ स्तोत्रमपीच्यवाचः।
सत्युत्तमश्लोकगुणानुवादे
जुगुप्सितं न स्तवयन्ति सभ्याः॥ २३
tasmātparokṣe'smadupaśrutānyalaṃ
kariṣyatha stotramapīcyavācaḥ|
satyuttamaślokaguṇānuvāde
jugupsitaṃ na stavayanti sabhyāḥ|| 23
अर्थ
मृदुभाषियो! कालान्तरमें जब मेरे अप्रकट गुण प्रकट हो जायँ, तब भरपेट अपनी मधुर वाणीसे मेरी स्तुति कर लेना। देखो, शिष्ट पुरुष पवित्रकीर्ति श्रीहरिके गुणानुवादके रहते हुए तुच्छ मनुष्योंकी स्तुति नहीं किया करते॥ २३॥