श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.8

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अहो उभयतः प्राप्तं लोकस्य व्यसनं महत्।

दारुण्युभयतो दीप्ते इव तस्करपालयोः॥ ८

aho ubhayataḥ prāptaṃ lokasya vyasanaṃ mahat|

dāruṇyubhayato dīpte iva taskarapālayoḥ|| 8

अर्थ

‘अहो! जैसे दोनों ओर जलती हुई लकड़ीके बीचमें रहनेवाले चींटी आदि जीव महान् संकटमें पड़ जाते हैं, वैसे ही इस समय सारी प्रजा एक ओर राजाके और दूसरी ओर चोर-डाकुओंके अत्याचारसे महान् संकटमें पड़ रही है॥ ८॥✎ 1602

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1602 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: समझ-कर → समझकर

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