॥ श्रीहरिः ॥
विनिश्चित्यैवमृषयो विपन्नस्य महीपतेः।
ममन्थुरूरुं तरसा तत्रासीद्बाहुको नरः॥ ४३
viniścityaivamṛṣayo vipannasya mahīpateḥ|
mamanthurūruṃ tarasā tatrāsīdbāhuko naraḥ|| 43
अर्थ
ऐसा निश्चय कर उन्होंने मृत राजाकी जाँघको बड़े जोरसे मथा तो उसमेंसे एक बौना पुरुष उत्पन्न हुआ॥ ४३॥
विनिश्चित्यैवमृषयो विपन्नस्य महीपतेः।
ममन्थुरूरुं तरसा तत्रासीद्बाहुको नरः॥ ४३
ऐसा निश्चय कर उन्होंने मृत राजाकी जाँघको बड़े जोरसे मथा तो उसमेंसे एक बौना पुरुष उत्पन्न हुआ॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.14.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 482) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/14/43/