श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.27

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

एते चान्ये च विबुधाः प्रभवो वरशापयोः।

देहे भवन्ति नृपतेः सर्वदेवमयो नृपः॥ २७

ete cānye ca vibudhāḥ prabhavo varaśāpayoḥ|

dehe bhavanti nṛpateḥ sarvadevamayo nṛpaḥ|| 27

अर्थ

विष्णु, ब्रह्मा, महादेव, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, मेघ, कुबेर, चन्द्रमा, पृथ्वी, अग्‍नि और वरुण तथा इनके अतिरिक्त जो दूसरे वर और शाप देनेमें समर्थ देवता हैं, वे सब-के-सब राजाके शरीरमें रहते हैं; इसलिये राजा सर्वदेवमय है और देवता उसके अंशमात्र हैं॥ २६-२७॥

यह अर्थ श्लोक 26–27 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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