श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.13

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

लोकधिक्कारसन्दग्धं दहिष्यामः स्वतेजसा।

एवमध्यवसायैनं मुनयो गूढमन्यवः।

उपव्रज्याब्रुवन् वेनं सान्त्वयित्वा च सामभिः॥ १३

lokadhikkārasandagdhaṃ dahiṣyāmaḥ svatejasā|

evamadhyavasāyainaṃ munayo gūḍhamanyavaḥ|

upavrajyābruvan venaṃ sāntvayitvā ca sāmabhiḥ|| 13

अर्थ

हमने जान-बूझकर दुराचारी वेनको राजा बनाया था। किन्तु यदि समझानेपर भी यह हमारी बात नहीं मानेगा, तो लोकके धिक्कारसे दग्ध हुए इस दुष्टको हम अपने तेजसे भस्म कर देंगे।’ ऐसा विचार करके मुनिलोग वेनके पास गये और अपने क्रोधको छिपाकर उसे प्रिय वचनोंसे समझाते हुए इस प्रकार कहने लगे॥ १२-१३॥✎ 1602

यह अर्थ श्लोक 12–13 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1602 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: समझ-कर → समझकर

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