श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.13.9

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

अव्यवच्छिन्‍नयोगाग्‍निदग्धकर्ममलाशयः।

स्वरूपमवरुन्धानो नात्मनोऽन्यं तदैक्षत॥ ९

avyavacchinnayogāgnidagdhakarmamalāśayaḥ|

svarūpamavarundhāno nātmano'nyaṃ tadaikṣata|| 9

अर्थ

उसके अन्तःकरणका वासनारूप मल अखण्ड योगाग्‍निसे भस्म हो गया था। इसलिये वह अपनी आत्माको विशुद्ध बोधरसके साथ अभिन्‍न, आनन्दमय और सर्वत्र व्याप्त देखता था। सब प्रकारके भेदसे रहित प्रशान्त ब्रह्मको ही वह अपना स्वरूप समझता था; तथा अपनी आत्मासे भिन्‍न कुछ भी नहीं देखता था॥ ८-९॥

यह अर्थ श्लोक 8–9 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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