उसके अन्तःकरणका वासनारूप मल अखण्ड योगाग्निसे भस्म हो गया था। इसलिये वह अपनी आत्माको विशुद्ध बोधरसके साथ अभिन्न, आनन्दमय और सर्वत्र व्याप्त देखता था। सब प्रकारके भेदसे रहित प्रशान्त ब्रह्मको ही वह अपना स्वरूप समझता था; तथा अपनी आत्मासे भिन्न कुछ भी नहीं देखता था॥ ८-९॥
यह अर्थ श्लोक 8–9 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
अव्यवच्छिन्नयोगाग्निदग्धकर्ममलाशयः।
स्वरूपमवरुन्धानो नात्मनोऽन्यं तदैक्षत॥ ९
उसके अन्तःकरणका वासनारूप मल अखण्ड योगाग्निसे भस्म हो गया था। इसलिये वह अपनी आत्माको विशुद्ध बोधरसके साथ अभिन्न, आनन्दमय और सर्वत्र व्याप्त देखता था। सब प्रकारके भेदसे रहित प्रशान्त ब्रह्मको ही वह अपना स्वरूप समझता था; तथा अपनी आत्मासे भिन्न कुछ भी नहीं देखता था॥ ८-९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.13.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 474) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/13/9/