ब्रह्मन्! उस स्थानपर उन्होंने भगवान्की जिन-जिन लीला-कथाओंका वर्णन किया था, वे सब पूर्णरूपसे मुझे सुनाइये; मुझे उनके सुननेकी बड़ी इच्छा है॥ ५॥✎ 386
यास्ता देवर्षिणा तत्र वर्णिता भगवत्कथाः।
मह्यं शुश्रूषवे ब्रह्मन् कार्त्स्न्येनाचष्टुमर्हसि॥ ५
ब्रह्मन्! उस स्थानपर उन्होंने भगवान्की जिन-जिन लीला-कथाओंका वर्णन किया था, वे सब पूर्णरूपसे मुझे सुनाइये; मुझे उनके सुननेकी बड़ी इच्छा है॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.13.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 473) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/13/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)