॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.13.48
विज्ञाय निर्विद्य गतं पतिं प्रजाः
पुरोहितामात्यसुहृद्गणादयः ।
विचिक्युरुर्व्यामतिशोककातरा
यथा निगूढं पुरुषं कुयोगिनः॥ ४८
vijñāya nirvidya gataṃ patiṃ prajāḥ
purohitāmātyasuhṛdgaṇādayaḥ |
vicikyururvyāmatiśokakātarā
yathā nigūḍhaṃ puruṣaṃ kuyoginaḥ|| 48
अर्थ
महाराज विरक्त होकर घरसे निकल गये हैं, यह जानकर सभी प्रजाजन, पुरोहित, मन्त्री और सुहृद्गण आदि अत्यन्त शोकाकुल होकर पृथ्वीपर उनकी खोज करने लगे। ठीक वैसे ही जैसे योगका यथार्थ रहस्य न जाननेवाले पुरुष अपने हृदयमें छिपे हुए भगवान्को बाहर खोजते हैं॥ ४८॥✎ 387