श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.13.42

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

तं विचक्ष्य खलं पुत्रं शासनैर्विविधैर्नृपः।

यदा न शासितुं कल्पो भृशमासीत्सुदुर्मनाः॥ ४२

taṃ vicakṣya khalaṃ putraṃ śāsanairvividhairnṛpaḥ|

yadā na śāsituṃ kalpo bhṛśamāsītsudurmanāḥ|| 42

अर्थ

वेनकी ऐसी दुष्ट प्रकृति देखकर महाराज अंगने उसे तरह-तरहसे सुधारनेकी चेष्टा की; परन्तु वे उसे सुमार्गपर लानेमें समर्थ न हुए। इससे उन्हें बड़ा ही दुःख हुआ॥ ४२॥

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