राजदण्डधारी वेनका भी ऐसा क्या अपराध था, जो धर्मज्ञ मुनीश्वरोंने उसके प्रति शापरूप ब्रह्मदण्डका प्रयोग किया॥ २२॥
किं वांहो वेन उद्दिश्य ब्रह्मदण्डमयूयुजन्।
दण्डव्रतधरे राज्ञि मुनयो धर्मकोविदाः॥ २२
राजदण्डधारी वेनका भी ऐसा क्या अपराध था, जो धर्मज्ञ मुनीश्वरोंने उसके प्रति शापरूप ब्रह्मदण्डका प्रयोग किया॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.13.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 475) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/13/22/