श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.12.7

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

वृणीहि कामं नृप यन्मनोगतं

मत्तस्त्वमौत्तानपदेऽविशङ्कितः ।

वरं वरार्होऽम्बुजनाभपादयो-

रनन्तरं त्वां वयमङ्ग शुश्रुम॥ ७

vṛṇīhi kāmaṃ nṛpa yanmanogataṃ

mattastvamauttānapade'viśaṅkitaḥ |

varaṃ varārho'mbujanābhapādayo-

ranantaraṃ tvāṃ vayamaṅga śuśruma|| 7

अर्थ

प्रियवर! हमने सुना है, तुम सर्वदा भगवान् कमलनाभके चरणकमलोंके समीप रहनेवाले हो; इसलिये तुम अवश्य ही वर पानेयोग्य हो। ध्रुव! तुम्हें जिस वरकी इच्छा हो, मुझसे निःसंकोच एवं निःशंक होकर माँग लो॥ ७॥

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