hitvārbhakaḥ krīḍanakāni māturgṛhaṃ ca viṣṇuṃ śaraṇaṃ yo jagāma|| 52
अर्थ
ध्रुवजीके कर्म सर्वत्र प्रसिद्ध और परम पवित्र हैं; वे अपनी बाल्यावस्थामें ही माताके घर और खिलौनोंका मोह छोड़कर श्रीविष्णुभगवान्की शरणमें चले गये थे। कुरुनन्दन! उनका यह पवित्र चरित्र मैंने तुम्हें सुना दिया॥ ५२॥✎ 385
इदं मया तेऽभिहितं कुरूद्वह ध्रुवस्य विख्यातविशुद्धकर्मणः।
हित्वार्भकः क्रीडनकानि मातुर्गृहं च विष्णुं शरणं यो जगाम॥ ५२
ध्रुवजीके कर्म सर्वत्र प्रसिद्ध और परम पवित्र हैं; वे अपनी बाल्यावस्थामें ही माताके घर और खिलौनोंका मोह छोड़कर श्रीविष्णुभगवान्की शरणमें चले गये थे। कुरुनन्दन! उनका यह पवित्र चरित्र मैंने तुम्हें सुना दिया॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.12.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 473) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/52/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#385 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीविष्णुभगवान् की → श्रीविष्णुभगवान्की