॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.12.50
श्रावयेच्छ्रद्दधानानां तीर्थपादपदाश्रयः।
नेच्छंस्तत्रात्मनाऽऽत्मानं सन्तुष्ट इति सिध्यति॥ ५०
śrāvayecchraddadhānānāṃ tīrthapādapadāśrayaḥ|
necchaṃstatrātmanā''tmānaṃ santuṣṭa iti sidhyati|| 50
अर्थ
भगवान्के परम पवित्र चरणोंकी शरणमें रहनेवाला जो पुरुष इसे निष्कामभावसे पूर्णिमा, अमावास्या, द्वादशी, श्रवण नक्षत्र, तिथिक्षय, व्यतीपात, संक्रान्ति अथवा रविवारके दिन श्रद्धालु पुरुषोंको सुनाता है, वह स्वयं अपने आत्मामें ही सन्तुष्ट रहने लगता है और सिद्ध हो जाता है॥ ४९-५०॥✎ 384