tadgaccha dhruva bhadraṃ te bhagavantamadhokṣajam|
sarvabhūtātmabhāvena sarvabhūtātmavigraham|| 5
अर्थ
ध्रुव! अब तुम जाओ, भगवान् तुम्हारा मंगल करें। तुम संसारपाशसे मुक्त होनेके लिये सब जीवोंमें समदृष्टि रखकर सर्वभूतात्मा भगवान् श्रीहरिका भजन करो। वे संसारपाशका छेदन करनेवाले हैं तथा संसारकी उत्पत्ति आदिके लिये अपनी त्रिगुणात्मिका मायाशक्तिसे युक्त होकर भी वास्तवमें उससे रहित हैं। उनके चरणकमल ही सबके लिये भजन करनेयोग्य हैं॥ ५-६॥
यह अर्थ श्लोक 5–6 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
तद्गच्छ ध्रुव भद्रं ते भगवन्तमधोक्षजम्।
सर्वभूतात्मभावेन सर्वभूतात्मविग्रहम्॥ ५
ध्रुव! अब तुम जाओ, भगवान् तुम्हारा मंगल करें। तुम संसारपाशसे मुक्त होनेके लिये सब जीवोंमें समदृष्टि रखकर सर्वभूतात्मा भगवान् श्रीहरिका भजन करो। वे संसारपाशका छेदन करनेवाले हैं तथा संसारकी उत्पत्ति आदिके लिये अपनी त्रिगुणात्मिका मायाशक्तिसे युक्त होकर भी वास्तवमें उससे रहित हैं। उनके चरणकमल ही सबके लिये भजन करनेयोग्य हैं॥ ५-६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.12.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 468) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/5/