श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.12.43

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

यः क्षत्रबन्धुर्भुवि तस्याधिरूढ-

मन्वारुरुक्षेदपि वर्षपूगैः।

षट्पंचवर्षो यदहोभिरल्पैः

प्रसाद्य वैकुण्ठमवाप तत्पदम्॥ ४३

yaḥ kṣatrabandhurbhuvi tasyādhirūḍha-

manvārurukṣedapi varṣapūgaiḥ|

ṣaṭpaṃcavarṣo yadahobhiralpaiḥ

prasādya vaikuṇṭhamavāpa tatpadam|| 43

अर्थ

ध्रुवजीने तो पाँच-छः वर्षकी अवस्थामें कुछ दिनोंकी तपस्यासे ही भगवान्‌को प्रसन्‍न करके उनका परमपद प्राप्त कर लिया; किन्तु उनके अधिकृत किये हुए इस पदको भूमण्डलमें कोई दूसरा क्षत्रिय क्या वर्षोंतक तपस्या करके भी पा सकता है?॥ ४३॥✎ 383

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #383 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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