ऋषिवर नारायणके द्वारा आविष्कृत उस अस्त्रको धनुषपर चढ़ाते ही उससे राजहंसके-से पक्ष और सोनेके फलवाले बड़े तीखे बाण निकले और जिस प्रकार मयूर केकारव करते वनमें घुस जाते हैं, उसी प्रकार भयानक साँय-साँय शब्द करते हुए वे शत्रुकी सेनामें घुस गये॥ ३॥✎ 1599
तस्यार्षास्त्रं धनुषि प्रयुंजतः
सुवर्णपुङ्खाः कलहंसवाससः।
विनिःसृता आविविशुर्द्विषद्बलं
यथा वनं भीमरवाः शिखण्डिनः॥ ३
ऋषिवर नारायणके द्वारा आविष्कृत उस अस्त्रको धनुषपर चढ़ाते ही उससे राजहंसके-से पक्ष और सोनेके फलवाले बड़े तीखे बाण निकले और जिस प्रकार मयूर केकारव करते वनमें घुस जाते हैं, उसी प्रकार भयानक साँय-साँय शब्द करते हुए वे शत्रुकी सेनामें घुस गये॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.11.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 464) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/11/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)