उन्होंने देखा कि बहुत-से सर्प वज्रकी तरह फुफकार मारते रोषपूर्ण नेत्रोंसे आगकी चिनगारियाँ उगलते आ रहे हैं; झुंड-के-झुंड मतवाले हाथी, सिंह और बाघ भी दौड़े चले आ रहे हैं॥ २६॥
अहयोऽशनिनिःश्वासा वमन्तोऽग्निं रुषाक्षिभिः।
अभ्यधावन् गजा मत्ताः सिंहव्याघ्राश्च यूथशः॥ २६
उन्होंने देखा कि बहुत-से सर्प वज्रकी तरह फुफकार मारते रोषपूर्ण नेत्रोंसे आगकी चिनगारियाँ उगलते आ रहे हैं; झुंड-के-झुंड मतवाले हाथी, सिंह और बाघ भी दौड़े चले आ रहे हैं॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.10.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 463) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/10/26/