श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.57

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

सोऽयं स्थितिव्यतिकरोपशमाय सृष्टान्

सत्त्वेन नः सुरगणाननुमेयतत्त्वः।

दृश्याददभ्रकरुणेन विलोकनेन

यच्छ्रीनिकेतममलं क्षिपतारविन्दम्॥ ५७

so'yaṃ sthitivyatikaropaśamāya sṛṣṭān

sattvena naḥ suragaṇānanumeyatattvaḥ|

dṛśyādadabhrakaruṇena vilokanena

yacchrīniketamamalaṃ kṣipatāravindam|| 57

अर्थ

जिनके तत्त्वका शास्त्रके आधारपर हमलोग केवल अनुमान ही करते हैं, प्रत्यक्ष नहीं कर पाते—उन्हीं भगवान्‌ने देवताओंको संसारकी मर्यादामें किसी प्रकारकी गड़बड़ी न हो, इसीलिये सत्त्वगुणसे उत्पन्‍न किया है। अब वे अपने करुणामय नेत्रोंसे—जो समस्त शोभा और सौन्दर्यके निवासस्थान निर्मल दिव्य कमलको भी नीचा दिखानेवाले हैं—हमारी ओर निहारें॥ ५७॥✎ 357

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #357 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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