श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.31

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

अथास्मदंशभूतास्ते आत्मजा लोकविश्रुताः।

भवितारोऽङ्ग भद्रं ते विस्रप्स्यन्ति च ते यशः॥ ३१

athāsmadaṃśabhūtāste ātmajā lokaviśrutāḥ|

bhavitāro'ṅga bhadraṃ te visrapsyanti ca te yaśaḥ|| 31

अर्थ

प्रिय महर्षे! तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारे यहाँ हमारे ही अंशस्वरूप तीन जगद्विख्यात पुत्र उत्पन्‍न होंगे और तुम्हारे सुन्दर यशका विस्तार करेंगे॥ ३१॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें