उस समय वे मन-ही-मन यही प्रार्थना करते थे कि ‘जो कोई सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर हैं, मैं उनकी शरणमें हूँ; वे मुझे अपने ही समान सन्तान प्रदान करें’॥ २०॥
शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्वरः।
प्रजामात्मसमां मह्यं प्रयच्छत्विति चिन्तयन्॥ २०
उस समय वे मन-ही-मन यही प्रार्थना करते थे कि ‘जो कोई सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर हैं, मैं उनकी शरणमें हूँ; वे मुझे अपने ही समान सन्तान प्रदान करें’॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.1.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 407) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/20/