श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तस्मिन् प्रसूनस्तबकपलाशाशोककानने।

वार्भिःस्रवद्भिरुद्घुष्टे निर्विन्ध्यायाः समन्ततः॥ १८

tasmin prasūnastabakapalāśāśokakānane|

vārbhiḥsravadbhirudghuṣṭe nirvindhyāyāḥ samantataḥ|| 18

अर्थ

वहाँ पलाश और अशोकके वृक्षोंका एक विशाल वन था। उसके सभी वृक्ष फूलोंके गुच्छोंसे लदे थे तथा उसमें सब ओर निर्विन्ध्या नदीके जलकी कलकल ध्वनि गूँजती रहती थी॥ १८॥

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