praticakṣīta māṃ loko jahyāttarhyeva kaśmalam|| 32
अर्थ
जिस समय जीव काष्ठमें व्याप्त अग्निके समान समस्त भूतोंमें मुझे ही स्थित देखता है, उसी समय वह अपने अज्ञानरूप मलसे मुक्त हो जाता है॥ ३२॥
यदा तु सर्वभूतेषु दारुष्वग्निमिव स्थितम्।
प्रतिचक्षीत मां लोको जह्यात्तर्ह्येव कश्मलम्॥ ३२
जिस समय जीव काष्ठमें व्याप्त अग्निके समान समस्त भूतोंमें मुझे ही स्थित देखता है, उसी समय वह अपने अज्ञानरूप मलसे मुक्त हो जाता है॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.9.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 277) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/9/32/