श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.9.22

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

सोऽयं समस्तजगतां सुहृदेक आत्मा

सत्त्वेन यन्मृडयते भगवान् भगेन।

तेनैव मे दृशमनुस्पृशताद्यथाहं

स्रक्ष्यामि पूर्ववदिदं प्रणतप्रियोऽसौ॥ २२

so'yaṃ samastajagatāṃ suhṛdeka ātmā

sattvena yanmṛḍayate bhagavān bhagena|

tenaiva me dṛśamanuspṛśatādyathāhaṃ

srakṣyāmi pūrvavadidaṃ praṇatapriyo'sau|| 22

अर्थ

आप सम्पूर्ण जगत‍्के एकमात्र सुहृद‍् और आत्मा हैं तथा शरणागतोंपर कृपा करनेवाले हैं। अतः अपने जिस ज्ञान और ऐश्‍वर्यसे आप विश्‍वको आनन्दित करते हैं, उसीसे मेरी बुद्धिको भी युक्त करें—जिससे मैं पूर्वकल्पके समान इस समय भी जगत‍्की रचना कर सकूँ॥ २२॥✎ 238

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #238 शब्दोंके बीचका स्थान: पुरुषोत्तमभगवान् को → पुरुषोत्तमभगवान्‌को

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें