श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.9.17

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

लोको विकर्मनिरतः कुशले प्रमत्तः

कर्मण्ययं त्वदुदिते भवदर्चने स्वे।

यस्तावदस्य बलवानिह जीविताशां

सद्यश्छिनत्त्यनिमिषाय नमोऽस्तु तस्मै॥ १७

loko vikarmanirataḥ kuśale pramattaḥ

karmaṇyayaṃ tvadudite bhavadarcane sve|

yastāvadasya balavāniha jīvitāśāṃ

sadyaśchinattyanimiṣāya namo'stu tasmai|| 17

अर्थ

भगवन्! आपने अपनी आराधनाको ही लोकोंके लिये कल्याणकारी स्वधर्म बताया है, किन्तु वे इस ओरसे उदासीन रहकर सर्वदा विपरीत (निषिद्ध) कर्मोंमें लगे रहते हैं। ऐसी प्रमादकी अवस्थामें पड़े हुए इन जीवोंकी जीवन-आशाको जो सदा सावधान रहकर बड़ी शीघ्रतासे काटता रहता है, वह बलवान् काल भी आपका ही रूप है; मैं उसे नमस्कार करता हूँ॥ १७॥✎ 238

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #238 शब्दोंके बीचका स्थान: पुरुषोत्तमभगवान् को → पुरुषोत्तमभगवान्‌को

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