श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.9.10

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

अह्न्यापृतार्तकरणा निशि निःशयाना

नानामनोरथधिया क्षणभग्ननिद्राः।

दैवाहतार्थरचना ऋषयोऽपि देव

युष्मत्प्रसङ्गविमुखा इह संसरन्ति॥ १०

ahnyāpṛtārtakaraṇā niśi niḥśayānā

nānāmanorathadhiyā kṣaṇabhagnanidrāḥ|

daivāhatārtharacanā ṛṣayo'pi deva

yuṣmatprasaṅgavimukhā iha saṃsaranti|| 10

अर्थ

देव! औरोंकी तो बात ही क्या—जो साक्षात् मुनि हैं, वे भी यदि आपके कथाप्रसंगसे विमुख रहते हैं तो उन्हें संसारमें फँसना पड़ता है। वे दिनमें अनेक प्रकारके व्यापारोंके कारण विक्षिप्तचित्त रहते हैं, रात्रिमें निद्रामें अचेत पड़े रहते हैं; उस समय भी तरह-तरहके मनोरथोंके कारण क्षण-क्षणमें उनकी नींद टूटती रहती है तथा दैववश उनकी अर्थसिद्धिके सब उद्योग भी विफल होते रहते हैं॥ १०॥

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