श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.8.25

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

आयामतो विस्तरतः स्वमान-

देहेन लोकत्रयसंग्रहेण।

विचित्रदिव्याभरणांशुकानां

कृतश्रियापाश्रितवेषदेहम्१ ॥ २५

āyāmato vistarataḥ svamāna-

dehena lokatrayasaṃgraheṇa|

vicitradivyābharaṇāṃśukānāṃ

kṛtaśriyāpāśritaveṣadeham || 25

अर्थ

उनका वह श्रीविग्रह अपने परिमाणसे लंबाई-चौड़ाईमें त्रिलोकीका संग्रह किये हुए है। वह अपनी शोभासे विचित्र एवं दिव्य वस्त्राभूषणोंकी शोभाको सुशोभित करनेवाला होनेपर भी पीताम्बर आदि अपनी वेशभूषासे सुसज्जित है॥ २५॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—श्रितदेहवेषम्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 270)

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