जिस समय भगवान्की दृष्टि अपनेमें निहित लिंगशरीरादि सूक्ष्मतत्त्वपर पड़ी, तब वह कालाश्रित रजोगुणसे क्षुभित होकर सृष्टिरचनाके निमित्त उनके नाभिदेशसे बाहर निकला॥ १३॥✎ 235236
तस्यार्थसूक्ष्माभिनिविष्टदृष्टे-
रन्तर्गतोऽर्थो रजसा तनीयान्।
गुणेन कालानुगतेन विद्धः
सूष्यंस्तदाभिद्यत नाभिदेशात्॥ १३
जिस समय भगवान्की दृष्टि अपनेमें निहित लिंगशरीरादि सूक्ष्मतत्त्वपर पड़ी, तब वह कालाश्रित रजोगुणसे क्षुभित होकर सृष्टिरचनाके निमित्त उनके नाभिदेशसे बाहर निकला॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.8.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 269) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/8/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#235 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् की → विष्णुभगवान्की