॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.8.11
सोऽन्तःशरीरेऽर्पितभूतसूक्ष्मः
कालात्मिकां शक्तिमुदीरयाणः।
उवास तस्मिन् सलिले पदे स्वे
यथानलो दारुणि रुद्धवीर्यः॥ ११
so'ntaḥśarīre'rpitabhūtasūkṣmaḥ
kālātmikāṃ śaktimudīrayāṇaḥ|
uvāsa tasmin salile pade sve
yathānalo dāruṇi ruddhavīryaḥ|| 11
अर्थ
जिस प्रकार अग्नि अपनी दाहिका आदि शक्तियोंको छिपाये हुए काष्ठमें व्याप्त रहता है, उसी प्रकार श्रीभगवान्ने सम्पूर्ण प्राणियोंके सूक्ष्म शरीरोंको अपने शरीरमें लीन करके अपने आधारभूत उस जलमें शयन किया, उन्हें सृष्टिकाल आनेपर पुनः जगानेके लिये केवल कालशक्तिको जाग्रत् रखा॥ ११॥✎ 234