श्रीमैत्रेयजीने कहा—जो आत्मा सबका स्वामी और सर्वथा मुक्तस्वरूप है, वही दीनता और बन्धनको प्राप्त हो—यह बात युक्तिविरुद्ध अवश्य है; किन्तु वस्तुतः यही तो भगवान्की माया है॥ ९॥✎ 227
सेयं भगवतो माया यन्नयेन विरुध्यते।
ईश्वरस्य विमुक्तस्य कार्पण्यमुत बन्धनम्॥ ९
श्रीमैत्रेयजीने कहा—जो आत्मा सबका स्वामी और सर्वथा मुक्तस्वरूप है, वही दीनता और बन्धनको प्राप्त हो—यह बात युक्तिविरुद्ध अवश्य है; किन्तु वस्तुतः यही तो भगवान्की माया है॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.7.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 263) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/7/9/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)