श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.7.16

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

साध्वेतद् व्याहृतं विद्वन्‍नात्ममायायनं हरेः।

आभात्यपार्थं निर्मूलं विश्‍वमूलं न य२द्बहिः॥ १६

sādhvetad vyāhṛtaṃ vidvannātmamāyāyanaṃ hareḥ|

ābhātyapārthaṃ nirmūlaṃ viśvamūlaṃ na yadbahiḥ|| 16

अर्थ

विद्वन्! आपने यह बात बहुत ठीक कही कि जीवको जो क्लेशादिकी प्रतीति हो रही है, उसका आधार केवल भगवान्‌की माया ही है। वह क्लेश मिथ्या एवं निर्मूल ही है; क्योंकि इस विश्‍वका मूल कारण ही मायाके अतिरिक्त और कुछ नहीं है॥ १६॥✎ 228 229 230

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—त०।

    (मुद्रित पृष्ठ 264)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #228 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को
  • #229 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #230 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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