श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.40

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

यतोऽप्राप्य न्यवर्तन्त वाचश्‍च मनसा सह।

अहं चान्य इमे देवास्तस्मै भगवते नमः॥ ४०

yato'prāpya nyavartanta vācaśca manasā saha|

ahaṃ cānya ime devāstasmai bhagavate namaḥ|| 40

अर्थ

जहाँ न पहुँचकर मनके सहित वाणी भी लौट आती है तथा जिनका पार पानेमें अहंकारके अभिमानी रुद्र तथा अन्य इन्द्रियाधिष्ठाता देवता भी समर्थ नहीं हैं, उन श्रीभगवान्‌को हम नमस्कार करते हैं॥ ४०॥✎ 222 223 224 225

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #222 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को
  • #223 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #224 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #225 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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