भगवान्की दोनों जाँघोंसे सब लोगोंका निर्वाह करनेवाली वैश्यवृत्ति उत्पन्न हुई और उन्हींसे वैश्य वर्णका भी प्रादुर्भाव हुआ। यह वर्ण अपनी वृत्तिसे सब जीवोंकी जीविका चलाता है॥ ३२॥✎ 221
विशोऽवर्तन्त तस्योर्वोर्लोकवृत्तिकरीर्विभोः।
वैश्यस्तदुद्भवो वार्तां नृणां यः समवर्तयत्॥ ३२
भगवान्की दोनों जाँघोंसे सब लोगोंका निर्वाह करनेवाली वैश्यवृत्ति उत्पन्न हुई और उन्हींसे वैश्य वर्णका भी प्रादुर्भाव हुआ। यह वर्ण अपनी वृत्तिसे सब जीवोंकी जीविका चलाता है॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.6.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 261) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/6/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)