श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.32

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

विशोऽवर्तन्त तस्योर्वोर्लोकवृत्तिकरीर्विभोः।

वैश्यस्तदुद्भवो वार्तां नृणां यः समवर्तयत्॥ ३२

viśo'vartanta tasyorvorlokavṛttikarīrvibhoḥ|

vaiśyastadudbhavo vārtāṃ nṛṇāṃ yaḥ samavartayat|| 32

अर्थ

भगवान्‌की दोनों जाँघोंसे सब लोगोंका निर्वाह करनेवाली वैश्यवृत्ति उत्पन्‍न हुई और उन्हींसे वैश्य वर्णका भी प्रादुर्भाव हुआ। यह वर्ण अपनी वृत्तिसे सब जीवोंकी जीविका चलाता है॥ ३२॥✎ 221

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #221 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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