फिर विराट् पुरुषके तालु उत्पन्न हुआ; उसमें लोक-पाल वरुण अपने अंश रसनेन्द्रियके सहित स्थित हुआ, जिससे जीव रस ग्रहण करता है॥ १३॥✎ 220
निर्भिन्नं तालु वरुणो लोकपालोऽविशद्धरेः।
जिह्वयांशेन च रसं ययासौ प्रतिपद्यते॥ १३
फिर विराट् पुरुषके तालु उत्पन्न हुआ; उसमें लोक-पाल वरुण अपने अंश रसनेन्द्रियके सहित स्थित हुआ, जिससे जीव रस ग्रहण करता है॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.6.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 260) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/6/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#220 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने