हमें यह भी सुनाइये कि उन समस्त लोकपतियोंके स्वामी श्रीहरिने इन लोकों, लोकपालों और लोकालोक-पर्वतसे बाहरके भागोंको, जिनमें ये सब प्रकारके प्राणियोंके अधिकारानुसार भिन्न-भिन्न भेद प्रतीत हो रहे हैं, किन तत्त्वोंसे रचा है॥ ८॥✎ 20915851586
यैस्तत्त्वभेदैरधिलोकनाथो
लोकानलोकान् सह लोकपालान्।
अचीक्लृपद्यत्र हि सर्वसत्त्व-
निकायभेदोऽधिकृतः प्रतीतः॥ ८
हमें यह भी सुनाइये कि उन समस्त लोकपतियोंके स्वामी श्रीहरिने इन लोकों, लोकपालों और लोकालोक-पर्वतसे बाहरके भागोंको, जिनमें ये सब प्रकारके प्राणियोंके अधिकारानुसार भिन्न-भिन्न भेद प्रतीत हो रहे हैं, किन तत्त्वोंसे रचा है॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.5.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 254) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/5/8/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)