श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.6

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

यथा पुनः स्वे ख इदं निवेश्य

शेते गुहायां स निवृत्तवृत्तिः।

योगेश्‍वराधीश्‍वर एक एत-

दनुप्रविष्टो बहुधा यथाऽऽसीत्॥ ६

yathā punaḥ sve kha idaṃ niveśya

śete guhāyāṃ sa nivṛttavṛttiḥ|

yogeśvarādhīśvara eka eta-

danupraviṣṭo bahudhā yathā''sīt|| 6

अर्थ

त्रिलोकीके नियन्ता और परम स्वतन्त्र श्रीहरि अवतार लेकर जो-जो लीलाएँ करते हैं; जिस प्रकार अकर्ता होकर भी उन्होंने कल्पके आरम्भमें इस सृष्टिकी रचना की, जिस प्रकार इसे स्थापित कर वे जगत‍्के जीवोंकी जीविकाका विधान करते हैं, फिर जिस प्रकार इसे अपने हृदयाकाशमें लीनकर वृत्तिशून्य हो योगमायाका आश्रय लेकर शयन करते हैं और जिस प्रकार वे योगेश्‍वरेश्‍वर प्रभु एक होनेपर भी इस ब्रह्माण्डमें अन्तर्यामीरूपसे अनुप्रविष्ट होकर अनेकों रूपोंमें प्रकट होते हैं—वह सब रहस्य आप हमें समझाइये॥ ५-६॥

यह अर्थ श्लोक 5–6 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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