श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.48

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

यावद्बलिं तेऽज हराम काले

यथा वयं चान्‍नमदाम यत्र।

यथोभयेषां त इमे हि लोका

बलिं हरन्तोऽन्‍नमदन्त्यनूहाः॥ ४८

yāvadbaliṃ te'ja harāma kāle

yathā vayaṃ cānnamadāma yatra|

yathobhayeṣāṃ ta ime hi lokā

baliṃ haranto'nnamadantyanūhāḥ|| 48

अर्थ

अतः जन्मरहित भगवन्! जिससे हम ब्रह्माण्ड रचकर आपको सब प्रकारके भोग समयपर समर्पण कर सकें और जहाँ स्थित होकर हम भी अपनी योग्यताके अनुसार अन्‍न ग्रहण कर सकें तथा ये सब जीव भी सब प्रकारकी विघ्न-बाधाओंसे दूर रहकर हम और आप दोनोंको भोग समर्पण करते हुए अपना-अपना अन्‍न भक्षण कर सकें, ऐसा कोई उपाय कीजिये॥ ४८॥

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