श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.38

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

देवा ऊचुः

नमाम ते देव पदारविन्दं

प्रपन्‍नतापोपशमातपत्रम् ।

यन्मूलकेता यतयोऽञ्जसोरु

संसारदुःखं बहिरुत्क्षिपन्ति॥ ३८

namāma te deva padāravindaṃ

prapannatāpopaśamātapatram |

yanmūlaketā yatayo'ñjasoru

saṃsāraduḥkhaṃ bahirutkṣipanti|| 38

अर्थ

देवताओंने कहा—देव! हम आपके चरण-कमलोंकी वन्दना करते हैं। ये अपनी शरणमें आये हुए जीवोंका ताप दूर करनेके लिये छत्रके समान हैं तथा इनका आश्रय लेनेसे यतिजन अनन्त संसारदुःखको सुगमतासे ही दूर फेंक देते हैं॥ ३८॥

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