श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.27

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

ततोऽभवन् महत्तत्त्वमव्यक्तात्कालचोदितात्।

विज्ञानात्माऽऽत्मदेहस्थं विश्‍वं व्यञ्जंस्तमोनुदः॥ २७

tato'bhavan mahattattvamavyaktātkālacoditāt|

vijñānātmā''tmadehasthaṃ viśvaṃ vyañjaṃstamonudaḥ|| 27

अर्थ

यह द्रष्टा और दृश्यका अनुसन्धान करनेवाली शक्ति ही—कार्यकारणरूपा माया है। महाभाग विदुरजी! इस भावाभावरूप अनिर्वचनीय मायाके द्वारा ही भगवान्‌ने इस विश्‍वका निर्माण किया है॥ २५॥ कालशक्तिसे जब यह त्रिगुणमयी माया क्षोभको प्राप्त हुई, तब उन इन्द्रियातीत चिन्मय परमात्माने अपने अंश पुरुषरूपसे उसमें चिदाभासरूप बीज स्थापित किया॥ २६॥ तब कालकी प्रेरणासे उस अव्यक्त मायासे महत्तत्त्व प्रकट हुआ। वह मिथ्या अज्ञानका नाशक होनेके कारण विज्ञानस्वरूप और अपनेमें सूक्ष्मरूपसे स्थित प्रपंचकी अभिव्यक्ति करनेवाला था॥ २७॥ फिर चिदाभास, गुण और कालके अधीन उस महत्तत्त्वने भगवान्‌की दृष्टि पड़नेपर इस विश्‍वकी रचनाके लिये अपना रूपान्तर किया॥ २८॥ महत्तत्त्वके विकृत होनेपर अहंकारकी उत्पत्ति हुई—जो कार्य (अधिभूत), कारण (अध्यात्म) और कर्ता (अधिदैव) रूप होनेके कारण भूत, इन्द्रिय और मनका कारण है॥ २९॥ वह अहंकार वैकारिक (सात्त्विक), तैजस (राजस) और तामस-भेदसे तीन प्रकारका है; अतः अहंतत्त्वमें विकार होनेपर वैकारिक अहंकारसे मन और जिनसे विषयोंका ज्ञान होता है वे इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देवता हुए॥ ३०॥ तैजस अहंकारसे ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ हुईं तथा तामस अहंकारसे सूक्ष्म भूतोंका कारण शब्द-तन्मात्र हुआ और उससे दृष्टान्तरूपसे आत्माका बोध करानेवाला आकाश उत्पन्‍न हुआ॥ ३१॥ भगवान्‌की दृष्टि जब आकाशपर पड़ी, तब उससे फिर काल, माया और चिदाभासके योगसे स्पर्शतन्मात्र हुआ और उसके विकृत होनेपर उससे वायुकी उत्पत्ति हुई॥ ३२॥ अत्यन्त बलवान् वायुने आकाशके सहित विकृत होकर रूपतन्मात्रकी रचना की और उससे संसारका प्रकाशक तेज उत्पन्‍न हुआ॥ ३३॥ फिर परमात्माकी दृष्टि पड़नेपर वायुयुक्त तेजने काल, माया और चिदंशके योगसे विकृत होकर रसतन्मात्रके कार्य जलको उत्पन्‍न किया॥ ३४॥ तदनन्तर तेजसे युक्त जलने ब्रह्मका दृष्टिपात होनेपर काल, माया और चिदंशके योगसे गन्धगुणमयी पृथ्वीको उत्पन्‍न किया॥ ३५॥ ✎ 212 213 214

यह व्याख्या श्लोक 3.5.25 से 3.5.35 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #212 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #213 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #214 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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