श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.23

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

भगवानेक आसेदमग्र आत्माऽऽत्मनां विभुः।

आत्मेच्छानुगतावात्मा नानामत्युपलक्षणः॥ २३

bhagavāneka āsedamagra ātmā''tmanāṃ vibhuḥ|

ātmecchānugatāvātmā nānāmatyupalakṣaṇaḥ|| 23

अर्थ

सृष्टिरचनाके पूर्व समस्त आत्माओंके आत्मा एक पूर्ण परमात्मा ही थे—न द्रष्टा था न दृश्य! सृष्टिकालमें अनेक वृत्तियोंके भेदसे जो अनेकता दिखायी पड़ती है, वह भी वही थे; क्योंकि उनकी इच्छा अकेले रहनेकी थी॥ २३॥ वे ही द्रष्टा होकर देखने लगे, परन्तु उन्हें दृश्य दिखायी नहीं पड़ा; क्योंकि उस समय वे ही अद्वितीय रूपसे प्रकाशित हो रहे थे। ऐसी अवस्थामें वे अपनेको असत्के समान समझने लगे। वस्तुतः वे असत् नहीं थे, क्योंकि उनकी शक्तियाँ ही सोयी थीं। उनके ज्ञानका लोप नहीं हुआ था॥ २४॥

यह व्याख्या श्लोक 3.5.23 से 3.5.24 तककी एक साथ है।

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