श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.14

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

ताञ्छोच्यशोच्यानविदोऽनुशोचे

हरेः कथायां विमुखानघेन।

क्षिणोति देवोऽनिमिषस्तु येषा-

मायुर्वृथावादगतिस्मृतीनाम् ॥ १४

tāñchocyaśocyānavido'nuśoce

hareḥ kathāyāṃ vimukhānaghena|

kṣiṇoti devo'nimiṣastu yeṣā-

māyurvṛthāvādagatismṛtīnām || 14

अर्थ

मुझे तो उन शोचनीयोंके भी शोचनीय अज्ञानी पुरुषोंके लिये निरन्तर खेद रहता है, जो अपने पिछले पापोंके कारण श्रीहरिकी कथाओंसे विमुख रहते हैं। हाय! कालभगवान् उनके अमूल्य जीवनको काट रहे हैं और वे वाणी, देह और मनसे व्यर्थ वाद-विवाद, व्यर्थ चेष्टा और व्यर्थ चिन्तनमें लगे रहते हैं॥ १४॥✎ 209 1585 1586

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #209 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1585 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पवित्र-कीर्ति → पवित्रकीर्ति
  • #1586 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: लोका-लोक-पर्वतसे → लोकालोक-पर्वतसे

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