श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इस प्रकार उद्धवजीके मुखसे अपने प्रिय बन्धुओंके विनाशका असह्य समाचार सुनकर परम ज्ञानी विदुरजीको जो शोक उत्पन्न हुआ, उसे उन्होंने ज्ञानद्वारा शान्त कर दिया॥ २३॥
इत्युद्धवादुपाकर्ण्य सुहृदां दुःसहं वधम्।
ज्ञानेनाशमयत्क्षत्ता शोकमुत्पतितं बुधः॥ २३
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इस प्रकार उद्धवजीके मुखसे अपने प्रिय बन्धुओंके विनाशका असह्य समाचार सुनकर परम ज्ञानी विदुरजीको जो शोक उत्पन्न हुआ, उसे उन्होंने ज्ञानद्वारा शान्त कर दिया॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.4.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 251) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/4/23/