श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.4.20

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

स एवमाराधितपादतीर्था-

दधीततत्त्वात्मविबोधमार्गः ।

प्रणम्य पादौ परिवृत्य देव-

मिहागतोऽहं विरहातुरात्मा॥ २०

sa evamārādhitapādatīrthā-

dadhītatattvātmavibodhamārgaḥ |

praṇamya pādau parivṛtya deva-

mihāgato'haṃ virahāturātmā|| 20

अर्थ

इस प्रकार पूज्यपाद गुरु श्रीकृष्णसे आत्मतत्त्वकी उपलब्धिका साधन सुनकर तथा उन प्रभुके चरणोंकी वन्दना और परिक्रमा करके मैं यहाँ आया हूँ। इस समय उनके विरहसे मेरा चित्त अत्यन्त व्याकुल हो रहा है॥ २०॥

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