॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.4.15
को न्वीश ते पादसरोजभाजां
सुदुर्लभोऽर्थेषु चतुर्ष्वपीह।
तथापि नाहं प्रवृणोमि भूमन्
भवत्पदाम्भोजनिषेवणोत्सुकः॥ १५
ko nvīśa te pādasarojabhājāṃ
sudurlabho'rtheṣu caturṣvapīha|
tathāpi nāhaṃ pravṛṇomi bhūman
bhavatpadāmbhojaniṣevaṇotsukaḥ|| 15
अर्थ
‘स्वामिन्! आपके चरणकमलोंकी सेवा करनेवाले पुरुषोंको इस संसारमें अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष—इन चारोंमेंसे कोई भी पदार्थ दुर्लभ नहीं है; तथापि मुझे उनमेंसे किसीकी इच्छा नहीं है। मैं तो केवल आपके चरणकमलोंकी सेवाके लिये ही लालायित रहता हूँ॥ १५॥