श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.4.15

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

को न्वीश ते पादसरोजभाजां

सुदुर्लभोऽर्थेषु चतुर्ष्वपीह।

तथापि नाहं प्रवृणोमि भूमन्

भवत्पदाम्भोजनिषेवणोत्सुकः॥ १५

ko nvīśa te pādasarojabhājāṃ

sudurlabho'rtheṣu caturṣvapīha|

tathāpi nāhaṃ pravṛṇomi bhūman

bhavatpadāmbhojaniṣevaṇotsukaḥ|| 15

अर्थ

‘स्वामिन्! आपके चरणकमलोंकी सेवा करनेवाले पुरुषोंको इस संसारमें अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष—इन चारोंमेंसे कोई भी पदार्थ दुर्लभ नहीं है; तथापि मुझे उनमेंसे किसीकी इच्छा नहीं है। मैं तो केवल आपके चरणकमलोंकी सेवाके लिये ही लालायित रहता हूँ॥ १५॥

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