श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.33.32

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

तस्यास्तद्योगविधुतमार्त्यं मर्त्यमभूत्सरित्।

स्रोतसां प्रवरा सौम्य सिद्धिदा सिद्धसेविता१॥ ३२

tasyāstadyogavidhutamārtyaṃ martyamabhūtsarit|

srotasāṃ pravarā saumya siddhidā siddhasevitā|| 32

अर्थ

साधुस्वभाव विदुरजी! योगसाधनके द्वारा उनके शरीरके सारे दैहिक मल दूर हो गये थे। वह एक नदीके रूपमें परिणत हो गया, जो सिद्धगणसे सेवित और सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाली है॥ ३२॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—सिद्धि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 404)

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