श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.33.21

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

वनं प्रव्रजिते पत्यावपत्यविरहातुरा।

ज्ञाततत्त्वाप्यभून्‍नष्टे वत्से गौरिव वत्सला॥ २१

vanaṃ pravrajite patyāvapatyavirahāturā|

jñātatattvāpyabhūnnaṣṭe vatse gauriva vatsalā|| 21

अर्थ

पतिके वनगमनके अनन्तर पुत्रका भी वियोग हो जानेसे वे आत्मज्ञानसम्पन्‍न होकर भी ऐसी व्याकुल हो गयीं, जैसे बछड़ेके बिछुड़ जानेसे उसे प्यार करनेवाली गौ॥ २१॥

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