श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.33.14

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

अ३भीक्ष्णावगाहकपिशान् जटिलान् कुटिलालकान्।

आत्मानं चोग्रतपसा बिभ्रती चीरिणं कृशम्॥ १४

abhīkṣṇāvagāhakapiśān jaṭilān kuṭilālakān|

ātmānaṃ cogratapasā bibhratī cīriṇaṃ kṛśam|| 14

अर्थ

त्रिकाल स्नान करनेसे उनकी घुँघराली अलकें भूरी-भूरी जटाओंमें परिणत हो गयीं तथा चीर-वस्त्रोंसे ढका हुआ शरीर उग्र तपस्याके कारण दुर्बल हो गया॥ १४॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—नीरावगाहकपिशं जटिलं कुटिलालकम्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 402)

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